Omkareshwar Jyotirlinga

संसार में कुल 12 ज्योतिर्लिंग है। इसमें से ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग ( Omkareshwar Jyotirlinga ) सबसे अधिक पूज्यनीय है शिव पुराणोक्त द्वादश ज्योतिर्लिंग स्त्रोत की इस श्लोक अनुसार 12 ज्योतिर्लिंग के नाम व उन सभी को अपने-अपने स्थान क्षेत्र के नाम से जाना जाता है।ओंकार ही करता है, ओंकार ही धरता है, ओंकार ही सर्वश्रेष्ठ है जगत की जितनी महान व महती वस्तु है वह सारी ओंकार का ही स्वरूप है। वेद यज्ञ ज्ञान व तपस्या यह सभी ओंकार से ही उत्पन्न हुआ है। ओंकार को ही समग्र जगत का अधिपति समझा जाता है।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग ( Omkareshwar Jyotirlinga ) की महत्ता इसी से प्रतिपादित हो जाती है कि चार धाम और 12 ज्योतिर्लिंगों की यात्रा तब तक पूर्ण नही मानी जाती जब तक ओंकारेश्वर एवं ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर जल नही चढ़ाया जाता।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग ( Omkareshwar Jyotirlinga ) अनादि अनंत है जो अनादि काल से ही विद्यमान थे
विद्यमान है और विद्यमान रहेंगे ।
शास्त्र कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से ही मनुष्य के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं अतः परम श्रद्धा भक्ति के साथ इनका दर्शन पूजन करना चाहिए। एकमात्र ओमकार स्वरूप प्राप्त करने के उद्देश्य से ही परिक्रमा करना चाहिए। भगवान ओंकारेश्वर का पूजन कर साष्टांग दंडवत प्रणाम करने से अधिक पुण्य लाभ मिलता है।

कथा


पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख है कि राजा रामचंद्र की 39 वी पीढ़ी के राजा मांधाता ने भोलेनाथ की तपस्या कर भगवान ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी जो कि स्वयं स्वयम्भू है। और उनसे 2 वरदान मांगे थे।उसी के फलस्वरूप मान्यता है कि रात्री के समय भगवान शिव खुद यहां आते है और यहां बिछाए हीरा पन्ना के चौपड़ पासे का खेल खेलते है। यहाँ की शयन आरती समस्त विश्व मे प्रसिद्ध है यहां रात रुकने के बाद अगली सुबह भगवान शिव उज्जैन चले जाते है।

ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर


ओंकारेश्वर मंदिर 5 मंजिला है।पांचों मंजिलों में 5 नाम से लिंग रूप में विराजमान ओमकारेश्वर ही विराजमान है । जिसके कारण यह पांच शिव दर्शन करने से ही ओमकारेश्वर का पूजन पूरा होना माना जाता है ।दूसरी मंजिल पर महाकालेश्वर तीसरी मंजिल पर सिद्धनाथ चौथी मंजिल पर केदारेश्वर और पांचवी मंजिल पर गुप्तेश्वर इनको धनेश्वर जलधारी नाम से भी कई भक्तों पुकारते हैं।

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