Omkar Parvat | Omkareshwar Parikrama | Omkareshwar Travel Guide


4 वेदो 18 पुराणो और असंख्य शास्त्रों का मूल मंत्र है ‘ ॐ’ | यूं तो ओंकार की गूंज भारत के कण – कण मे सुनाई देती है लेकिन इसी भारत भूमि पर एक स्थान ऐसा भी है जहां साक्षात भारत की पवित्र नदियां नर्मदा और कावेरी मिलकर ॐ आकार के टापू की रचना करती है।

इसी टापू (ओंकार पर्वत) पर ओंकारेश्वर के रूप मे नीलकंठ भगवान शंकर का वास है। नर्मदा और कवीरी की पवित्र धाराओ के साथ इन मंदिरो की परिक्रमा करना मतलब ॐ की परिक्रमा करने के समान है। देव  भूमि  की परिक्रमा करना मतलब ईश्वर के और करीब जाने का राश्ता है।

यहां भगवान ओमकारेश्वर मां पार्वती व पूरे परिवार के साथ तथा 33 कोटि देवी देवता अपने परिवार के साथ निवास करते हैं| यहां कई पौराणिक मंदिर है पांडवों ने अपने वनवास का समय यहीं पर काटा था| शंकराचार्य जी ने यहीं पर शिक्षा ली थी व हिंदुत्व की स्थापना की थी|

लगभग 7 किलोमीटर लंबा है रास्ते भर प्राचीन मंदिर, आश्रम, हरियाली, लाल मुंह के बंदर और गीता श्लोक लिखे हुए मिलेंगे

केदारेश्वर मंदिर ओंकारेश्वर

यह मंदिर प्राचीन समय से निर्मिति है ……
केदारनाथ ज्योतिर्लिंग हिमालय में विराज करते है। प्रचिन काल में बहुत भक्तों की आकुल प्रार्थना से भगवान केदारनाथ जी ओंकार पर्वत के इस स्थान पर पधारें थे । यहाँ पर केदारनाथ जी सदैव निवास करते है। यह सिद्ध स्थान है। केदारनाथ दर्शन पूजन व केदार गंगा स्नान कर मनुष्यों का पुनः जन्म नहीं होता, मुक्त हो जाता है। ठीक उसी तरह इस स्थान की महात्व भी वैसे ही है। अतः इस पवित्र केदारेशर शिवजी का दर्शन पूजन कर आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए अपना मूल स्वरूप ओंकार लाभ करने के लिए प्रार्थना करना चाहिए।
मंदिर के चारो और पत्थरो से निर्मित एक दीवार है जिसे प्राचीन काल मे परकोटा भी कहा जाता है।
मंदिर के सामने ही नंदी की प्रतिमा विराजमान है

ऋणमुक्तेश्वर मंदिर

ओंकारेश्वर
ओंकारपर्वत क्षेत्र पांडवों के अज्ञातवास का स्थल रहा है भगवान कृष्ण से जब उन्होने अपने कष्ट का कारण पूछा तो भगवान ने उन्हे पितृऋण के कारण इस अज्ञातवास को बताया साथ ही उन्होने ओंकार पर्वत परिक्रमा क्षेत्र में नर्मदा कावेरी संगम के पास स्थित एक प्राचीन मंदिर ऋण मुक्तेश्वर पर शिव कि पूजा का विधान बताया।पाण्डवो ने अज्ञातवास के दौरान कर्जमुक्ती के लिये भगवान शिव की तपस्या कर शिवलिंग की स्थापना की, पोराणिक काल में शिवलिंग पर सोने की दाल चढती थी बाद में चने की दाल चढाने का महत्व हो गया। जो व्यक्ति मम्लेश्वर लिंग के दर्शन कर ओंकार पर्वत कि परिक्रमा करते हुए संगम मॆ स्नान कर इस पवित्र लिंग का शुद्ध पवित्र भाव से विश्वास पूर्ण ढ़ंग से पूजन करता है। भगवान ऋण मुक्तेश्वर उसे सभी प्रकार के ॠणों से मुक्त करते है।

कुंती माता

यह मांदिर मांधाता द्वीप पर ॐकारेश्वर मंदिर से पूर्व की और स्थित है । जहाँ से प्रातः काल सूर्य अपनी ललिमा लिये हुए स्पष्ट दिखाई देता है ।
यह मंदिर कभी भव्य रूप मे रहा होगा। यहा की देवी कुंती माता जिन्हें कात्यायनी देवी व दस भूजा देवी के नाम से भी जाना जाता है। जो कभी मुचकुद किले की प्राचिर का भव्य मंदिर था। आज भी इस मँदिर के भग्नावशेष मंदिर की सुन्दरता को प्रकट करते है। इस मंदिर के गर्भग्रह में माता कुंती की ऊची प्रतिमा स्थित है जो की अब खंडित हो चुकी है। जिसके चेहरे के हाव भाव चित्ताकर्षित है। माता के बडे बडे नयन प्रमुख आकर्षण का केन्द्र है।

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